शंकरपार्वतीभ्याम् नमो नमः
गङ्गातरंग रमणिय जटकलापं
गौरी निरन्तर विभूषित वामभागम।
नारायण प्रिय मनंग मदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
वाचामगोचर मनेगगुणस्वरूपं
वागीशविष्णु सुरसेवित पादपीठम।
वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
भूताधिपं भुजग भूषण भूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम।
पाशांकुशाभय वरप्रद शूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाठम।।
शीतांशु शोभित किरीट विराजमानं
भालेक्शणानल विशोषित पंचबाणम।
नागाधिपारचित भासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
आप सभी का दिवस बरस मंगलमय हो,,,
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो,,,
ॐ नमः शिवाय !
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है,कल्याणकारी या शुभकारी।
यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है।
'शि' का अर्थ है,पापों का नाश करने वाला,
जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।
क्या है शिवलिंग
शिव की दो काया है।
एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए,दूसरी वह,जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग
के रूप में जानी जाती है।
शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है।
लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है।
संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न।
इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है।
शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव,शंकर,महादेव...
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है।
लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ।
इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं।
असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं।
शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है।
कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है।
शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा,विष्णु और महेश
(महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है।
इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना।
भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है।
इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
अर्द्धनारीश्वर क्यों....
शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है,इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं
या उनमें संपूर्णता नहीं।
वस्तुतः यह शिव ही हैं,जो आधे होते हुए भी सम्पूर्ण हैं।
इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं।
इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है।
दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
नारी प्रकृति है और नर पुरुष।
प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति।
दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।
अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं।
आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है,उसे शिव के इस स्वरूप
के आलोक में देखा-समझा जा सकता है।
यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है।
सृष्टि में सृजन संभव हो पाता है।
शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है।
नीलकंठ क्यों...
अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे,तभी समुद
से कालकूट नामक भयंकर विष निकला।
उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं।
समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया।
देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि,मुनि,मनुष्य,गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से
जलने लगे।
देवताओं की प्रार्थना पर,भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए।
उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए।
भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं।
उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया।
विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम
से प्रसिद्ध हुए।
भोले बाबा...
शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है।
एकबार उसे जंगल में देर हो गई।
तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया।
जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची।
वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा।
कथानुसार,बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं।
बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था।
शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे,जबकि शिकारी को
अपने शुभ कार्य का बोध नहीं था।
उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया।
कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं।
शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
हर हर महादेव!!
गङ्गातरंग रमणिय जटकलापं
गौरी निरन्तर विभूषित वामभागम।
नारायण प्रिय मनंग मदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
वाचामगोचर मनेगगुणस्वरूपं
वागीशविष्णु सुरसेवित पादपीठम।
वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
भूताधिपं भुजग भूषण भूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम।
पाशांकुशाभय वरप्रद शूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाठम।।
शीतांशु शोभित किरीट विराजमानं
भालेक्शणानल विशोषित पंचबाणम।
नागाधिपारचित भासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम॥
आप सभी का दिवस बरस मंगलमय हो,,,
समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो,,,
ॐ नमः शिवाय !
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है,कल्याणकारी या शुभकारी।
यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है।
'शि' का अर्थ है,पापों का नाश करने वाला,
जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।
क्या है शिवलिंग
शिव की दो काया है।
एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए,दूसरी वह,जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग
के रूप में जानी जाती है।
शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है।
लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है।
संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न।
इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है।
शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव,शंकर,महादेव...
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है।
लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ।
इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं।
असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं।
शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है।
कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है।
शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा,विष्णु और महेश
(महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है।
इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना।
भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है।
इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
अर्द्धनारीश्वर क्यों....
शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है,इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं
या उनमें संपूर्णता नहीं।
वस्तुतः यह शिव ही हैं,जो आधे होते हुए भी सम्पूर्ण हैं।
इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं।
इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है।
दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
नारी प्रकृति है और नर पुरुष।
प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति।
दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है।
अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं।
आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है,उसे शिव के इस स्वरूप
के आलोक में देखा-समझा जा सकता है।
यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है।
सृष्टि में सृजन संभव हो पाता है।
शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है।
नीलकंठ क्यों...
अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे,तभी समुद
से कालकूट नामक भयंकर विष निकला।
उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं।
समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया।
देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि,मुनि,मनुष्य,गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से
जलने लगे।
देवताओं की प्रार्थना पर,भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए।
उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए।
भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं।
उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया।
विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम
से प्रसिद्ध हुए।
भोले बाबा...
शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है।
एकबार उसे जंगल में देर हो गई।
तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया।
जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची।
वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा।
कथानुसार,बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं।
बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था।
शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे,जबकि शिकारी को
अपने शुभ कार्य का बोध नहीं था।
उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया।
कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं।
शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
हर हर महादेव!!
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